Bakra Eid Ki Kahani | बकरा ईद की कहानी, इतिहास, महत्व और रस्में
बकरा ईद, जिसे ईद-उल-अज़हा भी कहा जाता है, इस्लामी कैलेंडर के 12वें महीने ज़ुल-हिज्जा की 10वीं तारीख को मनाया जाने वाला एक बड़ा और पाक त्योहार है।
इस त्योहार का इतिहास पैगंबर इब्राहिम (अ.स.) और उनके बेटे इस्माइल (अ.स.) से जुड़ा हुआ है।
अल्लाह ने इब्राहिम (अ.स.) को उनके बेटे की कुर्बानी देने का हुक्म देकर एक कड़ी परीक्षा में डाला। उन्होंने अल्लाह के आदेश को मानते हुए कुर्बानी के लिए पूर्ण तैयारी कर ली।
लेकिन जैसे ही उन्होंने अपने बेटे को कुर्बान करना चाहा, अल्लाह ने एक बकरा भेज दिया और फरमाया कि — “तुम्हारी कुर्बानी कबूल कर ली गई।”
इसी याद में दुनिया भर के मुसलमान बकरा ईद पर कुर्बानी करते हैं।
इब्राहिम (अ.स.) को एक सपना आया जिसमें उन्होंने अपने बेटे इस्माइल (अ.स.) को कुर्बानी करते देखा। जब उन्होंने यह बात बेटे को बताई, तो इस्माइल ने कहा:
“अब्बा जान! अगर यह अल्लाह का हुक्म है तो आप मुझे कुर्बान कर दीजिए। इंशा-अल्लाह आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे।”
जब कुर्बानी का वक्त आया और इब्राहिम (अ.स.) ने चाकू चलाने की कोशिश की, अल्लाह ने पुकार कर कहा —
“ऐ इब्राहिम! तुमने अपनी परीक्षा पूरी कर दी।”
अल्लाह ने इस्माइल की जगह एक बड़ा मेंढ़ा भेज दिया और उसे कुर्बानी के लिए दिया। यही घटना बकरा ईद का आधार है।
कुर्बानी का असली मकसद जानवर नहीं, बल्कि नीयत और तक़्वा है।
“अल्लाह को न तुम्हारा गोश्त पहुँचता है और न खून, बल्कि उसे तुम्हारा तक़्वा पहुँचता है।”
(सूरह हज 22:37)
इस आयत से समझ आता है कि कुर्बानी का रूहानी पहलू सबसे अहम है।
इन जानवरों में उम्र, सेहत और शरीयती नियमों का ख्याल रखा जाता है।
यह बाँटने का तरीका इस्लाम की बराबरी और मोहब्बत की शिक्षा देता है।
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