हज़रत उमर फारूक (RA) का जीवन | Hazrat Umar Farooq Biography in Hindi
हजरत उमर फारूक (رضي الله عنه) इस्लाम के दूसरे खलीफा और पैगंबर मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) के एक प्रमुख साथी थे। उनका जन्म 586 ईस्वी में मक्का में हुआ था।
उमर फारूक के पिता का नाम खत्ताब था और उनकी माता का नाम हंतमाह था। उमर फारूक के एक बेटा था, जिसका नाम अब्दुल्लाह था।
उमर फारूक ने इस्लाम की शुरुआती दिनों में ही इस्लाम स्वीकार किया था। वह पैगंबर मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) के एक प्रमुख साथी बन गए और इस्लाम के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जब हजरत अबू बकर सिद्दीक (رضي الله عنه) का निधन हुआ, तो उमर फारूक को इस्लाम का दूसरा खलीफा चुना गया। वह एक न्यायप्रिय और धर्मपरायण नेता थे। उनके शासनकाल में इस्लाम का प्रसार बहुत तेजी से हुआ।
उमर फारूक की मृत्यु 644 ईस्वी में मदीना में एक पारसी दास, अबू लुलुअह के हाथों हुई थी।
उनकी विरासत इस्लाम के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण है। वह एक सच्चे मुसलमान और न्यायप्रिय नेता थे।
उमर फारूक एक कुरैशी परिवार से थे और पहले इस्लाम के विरोधी थे।
एक दिन, उमर फारूक की बहन फातिमा और उनके पति सईद इब्न ज़ैद ने इस्लाम स्वीकार कर लिया। उमर फारूक को यह बात बहुत बुरी लगी और उन्होंने अपनी बहन और जीजा को इस्लाम छोड़ने के लिए कहा। लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया।
उमर फारूक को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने अपनी बहन और जीजा को मारने की धमकी दी। लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनकी बहन और जीजा इस्लाम के लिए जान देने को तैयार हैं, तो उन्हें शर्मिंदगी महसूस हुई।
इसके बाद उन्होंने इस्लाम के बारे में गहराई से जानने का निर्णय लिया और पैगंबर मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) से मिलने गए। वहां उन्हें इस्लाम की सच्चाई का एहसास हुआ और उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया।
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